मुंबई:सत्य का सामना नयन मोंगिया जिस वक्त तक भारतीय टीम में थे तबतक विकेटकीपर का काम विकेट के पीछे गेंद को पकड़ना ही था। रन बना तो सोने पर सुहागा हो गया , नहीं बना तो कोई दिक्कत ही नहीं। पर वनडे क्रिकेट में धीरे-धीरे यह धारणा बदलने लगी । गिलक्रिस्ट नें इस धारणा को और तेज बदलने में बड़ी भूमिका निभाई । उनके आने के बाद तो लगभग हर टीम नें एक बेहतर विकेटकीपर बल्लेबाज की तलाश शुरू कर दी। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। मोंगिया के जाने के बाद सबा करीम, समीर दिघे, विजय दहिया, अजय रात्रा , दिनेश कार्तिक से होते हुए यह यात्रा धोनी पर आकर रुक जाती है।
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दिनेश कार्तिक 2004 के सितंबर महीने में टीम इंडिया में पदार्पण करते हैं । विकेट के पीछे दिनेश कार्तिक की मुस्तैदी लाजवाब थी। बैटिंग तकनीक और उनका टेंपरामेंट भी शानदार था। इसी का नतीजा है की पांच -साढ़े पांच रन की औसत वाले युग से खेलते हुए वह आज नौ-दस की औसत से खेले जाने वाले टी-ट्वेंटी के दौर में भी सफलतापूर्वक जमे हुए हैं। अगर लगातार एक -डेढ़ साल तक उन्हें टीम इंडिया में मौका मिला होता तो वह भारत के शायद श्रेष्ठ बल्लेबाजों में से एक होते। पर ऐसा हुआ नहीं । कारण थे धोनी।
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कार्तिक के पदार्पण के कुछ महीनों बाद 2004 की ही दिसम्बर की सर्दियों में धोनी को भारतीय टीम में मौका मिलता है। धोनी के कैरियर की शुरुआत खराब रही पर जिस वक्त उनपर टीम से बाहर होने का खतरा मंडरा रहा था ठीक उसी समय विशाखापत्तनम में पाकिस्तान के खिलाफ उसने एक सौ अड़तालीस रन की ऐतिहासिक पारी खेल डाली। इस एक पारी नें धोनी को रातों-रात स्टार बना दिया। इसके बाद धोनी को मौके मिलते रहे । धोनी नें भी पीछे मुड़कर नहीं देखा । दो हजार सात टी-ट्वेंटी विश्वकप आते-आते वह भारतीय टीम के कप्तान बन बैठे। फिर धोनी ने क्या किया वह इतिहास है।
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धोनी की तकनीक परम्परागत नहीं थी। उनके शाट परम्परागत क्रिकेटीय शाट नहीं होते थे। दिनेश कार्तिक इस मामले में धोनी से बेहतर थे। पर कार्तिक रन बनाने में धोनी की तुलना में फेल रहे। धोनी के आने से उन्हें मौके भी अब टुकड़ों में मिलने लगे। धोनी के 2007 विश्वकप विजेता कप्तान बनने के बाद कार्तिक के लिए रास्ते बंद ही हो गए। कार्तिक तकनीक, क्षमता आदि रखते हुए भी किस्मत की वजह से वह न बन सके जो वह बन सकते थे। धोनी के इतर अगर कार्तिक किसी और दशक में पैदा हुए होते तो अपने सन्यास के वक्त भारत के बड़े विकेटकीपर बल्लेबाजों में शुमार होते। पर शानदार दक्षता रखने के बाद भी कार्तिक का दुर्भाग्य यह रहा की वह धोनी के युग में पैदा हुए और खेले ।
