राजधानी रायपुर / सत्य का सामना / धमतरी के अर्जुनी भोयना ढाबे में रायपुर निवासी तीन युवकों की हत्या से पूरा प्रदेश सकते में हैँ परिवारजनो का रो रो कर बुरा हाल हैँ। किसी को खोना क्या होता हैँ उस परिवार से पूछो जिसके ऊपर यह गुजरती हैँ।

लेकिन हैरानी की बात यह हैँ की आरोपियों द्वारा हत्या करने के बाद विक्ट्री पोज़ देना, मंद मंद मुस्कुराना जैसे कोई जंग जीती हो या फिर देश के लिए कोई बड़ा काम किया हो, आरोपियों की इन तीन युवकों से न तो कोई पुरानी रंजिश थी न ही वें एक दूसरे को जानते थे लेकिन फिर भी तीनो की धारधार हत्यार से निर्मम हत्या यह पुलिस प्रशासन, सरकार, और समाज में सवाल पैदा करता हैँ?
हथियारों का आसानी से मिलना
आजकल युवाओं को अमेजान, फ्लिपकार्ट के माध्यम, चाकू, गुप्ति, तलवार जैसे कई धारधर हथियार आसानी से उपलब्ध हो जाते हैँ और ये हत्या, लूट जैसे आपराधिक घटनाओ को अंजाम देते हैँ, सरकार को इसपे पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाना चाहिए…..

चौक चौराहे में नशे का मिलना हुआ आम
आजकल युवाओं को सूखा नशा आसानी से चौक चौराहो गली मोह्हले, मेडिकल दुकानों में मिल जाता हैँ, टेन, नीला, ispoizmo, गांजा, ये सब नशीली पदार्थ जिसमें युवक नशा करके हैवान बन जाते हैँ जिसमें वो क्या कर रहे हैँ खुद को होश नहीं रहता..

हिंसात्मक फिल्मों का बढ़ता दुष्प्रभाव
फिल्मे समाज का आइना होती हैँ फिल्मे जो दिखाती हैँ जनता उसे देखती हैँ किन्तु पिछले एक दशक से हिंसात्मक फिल्मो का युवाओं पे बहुत बुरा प्रभाव पड़ा हैँ, वेब सीरीज में ऐसी फिल्मे आती हैँ जिसमें हिंसा और सेक्स के अलावा कुछ नहीं होता, बॉलीवुड में एनिमल, बागी सीरीज, या साउथ की फिल्मो को देखा जाये तो इसमें हिंसा को बढ़ावा मिलता हैँ, निर्देशक, निर्माता, एक्टर तो पैसे कमा लेते हैँ लेकिन इससे समाज को क्या संदेश जाता हैँ इससे समाज क्या सीखता हैँ यह बहुत बड़ा सवाल हैँ? भारत सरकार और सेंसर बोर्ड को इन फिल्मो के प्रदर्शन पर रोक लगाना चाहिए….


